आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़ाई : दूसरा स्वतंत्रता संग्राम

एम. वेंकैया नायडू

आज से ठीक तीन माह पूर्व हमने खुद ही स्वयं को कोरोना वायरस से बचाने के लिए घरों में कैद कर लिया था। अपने बचाव के लिए मास्क लगाने और सामाजिक दूरी रखने को तैयार हो गए। इस छोटी सी ही अवधि में ही हमें अनुभव हो गया कि बंदी क्या होती है। ये बंदी तो आज से 45 वर्ष पूर्व देश को तथाकथित आंतरिक विरोध से बचाने के नाम पर लगाई गई बंदी के मुकाबले कहीं अधिक वैध और औचित्यपूर्ण है। 21 महीने लंबी उस गैर कानूनी बंदी के दौरान नागरिकों को जीवन के अधिकार सहित उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। लाखों राजनेता, राजनैतिक कार्यकर्ता और नागरिकों को जेलों में भर दिया गया था। ये आपातकाल की काली अवधि थी। मैं स्वयं तीन अलग अलग जेलों में लगभग साढ़े सत्रह महीने बंद रहा और जन अधिकारों के इस दमन के खिलाफ एक सफल राष्ट्रीय आंदोलन के बाद ही जेल से रिहा हुआ। आज जब हम वर्तमान बंदी को धीरे धीरे खोल रहे हैं, मैं आपातकाल के उन भयावह दिनों को याद करता हूं। कानूनी और गैर कानूनी, वाजिब और गैर वाजिब बंदी की तुलना करता हूं।

आज 70% से अधिक हमारे देशवासियों का जन्म 22 मार्च 1977 के बाद हुआ है, उनको ये अनुभव ही नहीं है कि संविधान में सुनिश्चित किए गए नागरिकों के मूल अधिकारों से वंचित होना क्या होता है। लेकिन 25 जून 1975 को थोपे गए आपातकाल के दौरान वस्तुत: ऐसा हुआ, लोगों को उनके मूल अधिकारों से वंचित किया गया। चूंकि मुझे स्वयं इसका अनुभव है, मेरा प्रयास है कि मैं अपना अनुभव आपातकाल के बाद पैदा हुई पीढ़ी के साथ साझा करूं।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री एच आर खन्ना ने पूछा, तो जवाब में तत्कालीन अटॉर्नी जनरल श्री नीरेन डे ने जवाब में स्वीकार किया कि आपातकाल के दौरान यदि कोई निरपराध नागरिक किसी पुलिस वाले की गोली से मारा भी जाता है तो भी उसके पास कोई कानूनी राहत उपलब्ध नहीं होगी, यद्यपि स्वयं वे इससे खुश न होंगे। ये आपातकाल की भयावहता की एक बानगी मात्र है। उस जीवन का क्या मोल जब जीने का अधिकार ही नहीं है।

यदि वर्तमान बंदी कोरोना के कारण है तो वो बंदी जिसकी चर्चा मैं कर रहा हूं वो सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा उसके विरुद्ध राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त असंतोष के कारण लगाई गई थी। 1974 में गुजरात में भ्रष्टाचार के खिलाफ नव निर्माण आंदोलन चलाया गया, शीघ्र ही उसकी प्रतिध्वनि बिहार और देश के अन्य भागों में सुनाई देने लगी। वयोवृद्ध समाजवादी नेता स्वर्गीय श्री जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक जीवन की हर बुराई से निजात पाने के लिए ‘ सम्पूर्ण क्रांति ‘ का आह्वाहन किया। देश में परिवर्तन की लहर सी दौड़ गई। और फिर आया इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्णय जिसने लोक सभा के चुनाव में भ्रष्टाचार के कारण प्रधान मंत्री के चुनाव को ही रद्द कर दिया। इसके बाद तो जो हुआ वो इतिहास ही है, करोड़ों देशवासियों के घरों के दरवाजों पर अपातकाल ने दस्तक दी।

कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल लागू करने वाले संविधान का पाठ पढ़ा रहे हैं

1974 में विशाखापत्तनम के आंध्र विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई पूरी करके मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहा था। जब आपातकाल की घोषणा हुई तो मुझे अंडरग्राउंड हो जाने की सलाह दी गई। मेरा काम था तत्कालीन सम्पूर्ण आंध्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के आंदोलनकारी नेताओं और कार्यकर्ताओं को संदेश और सामग्री पहुँचाना। मैं दोपहिया वाहन पर चलता और आपातकाल के विरुद्ध प्रचार करता, संदेश और प्रकाशित सामग्री, बुकलेट पहुँचाया करता। मेरी तलाश कर रहे पुलिस वालों को संदेह न हो इससे बचने के लिए साथी कार्यकर्ताओं की छोटी बच्चियों को स्कूटर पर पीछे बैठा लेता। मैं प्रतिबंधित प्रकाशन और ‘वन्दे मातरम्’ पत्र बाँटता। मित्रों के साथ मिल कर आपातकाल के विरुद्ध पोस्टर और पैंफलेट सार्वजनिक स्थलों की दीवारों पर चिपकाता, सिनेमा हालों में पैंफलेट फेंकना और गिरफ्तारी से बचने के लिए भाग जाना, ये सब चलता।

जब मैं अंडरग्राउंड ही था तब ही मुझे जयप्रकाश नारायण जी के समाजवादी सहयोगी श्री एम एस अप्पा राव द्वारा मद्रास बुलाया गया जहाँ वरिष्ठ नेताओं की बैठक होने वाली थी, जिसमें आंदोलन की स्थिति तथा उसे और तेज़ करने की रणनीति पर विचार किया जाना था। यद्यपि मैं उन सबसे बहुत कनिष्ठ ही था फिर भी आंदोलन में मेरी सक्रियता को देख कर मुझे भी बुलाया गया। नीलम संजीव रेड्डी, गोटू लछन्ना, तन्नेती विश्वनाथम, शंकर सत्यनाराय‌ना, जैसे पुरोधा उस बैठक में सम्मिलित हुए। हम सभी वयोवृद्ध नेता श्री कामराज नाडार से भी मिलने गए, वे उन दिनों अस्वस्थ चल रहे थे। देश की स्थिति पर वे निराश दिखे तथा दिल्ली में उनकी पार्टी के एक महत्वपूर्ण निर्णय में अपनी भूमिका पर उन्हें पश्चाताप था। वो बुदबुदाए ” पोचू, एल्लम पोचु “अर्थात सब कुछ खत्म हो गया। उनके ये शब्द देश की स्थिति को आइना दिखा रहे थे।

एक दिन अपना दिन भर का काम खत्म करके मैं विजयवाड़ा के एक सिनेमा हाल में अपना स्कूटर खड़ा कर रहा था, इतने में एक पुलिसवाले ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। जैसे ही मैं पलटा, मैं उसके चेहरे की खुशी देख सकता था, लंबी खोज बीन के बाद मुझे पकड़ा जा सका था, उसने पास ही खड़े अपने किसी वरिष्ठ अधिकारी को अंगूठा उठा कर जीत का संकेत दिया। आपातकाल के नाम पर नागरिकों की आवाज़ दबाए जाने के दो महीने बाद ही मुझे पकड़ा जा सका। मुझे तत्काल राजमुंदरी जेल ले जाया गया। चूंकि वहाँ जगह ही नहीं बची थी तो मुझे विशाखापत्तनम जेल में भेज दिया गया। यहाँ मुझे सरदार गोटू लछन्ना, तेन्नेती विश्वनाथम, प्रख्यात कवि रचकोंडा विश्वनाथ शास्त्री जैसे वरिष्ठ नेताओं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कुछ प्रमुख नेताओं और यहाँ तक कि कुछ वामपंथी नेताओं से भी साक्षात मिलने और विचार विमर्श करने का अवसर मिला। मेरे कारावास का कारण यह था कि आंध्र विश्वविद्यालय तथा कॉलेजों के छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में मैंने स्वर्गीय श्री जयप्रकाश नारायण को आंध्र विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया था। तब मैं मुश्किल से 25 वर्ष का रहा होऊंगा। सत्ताधीशों के लिए मुझे मीसा के तहत जेल भेजने के लिए यह पर्याप्त कारण था। Maintenance of Internal Security Act (MISA) के अतिरिक्त Defence of India Rules (DIR) के तहत भी जेल भेजने का प्रावधान था जिसका प्रयोग किया जाता था।

विशाखापत्तनम जेल में बिताई गई अवधि ने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। विचारों में विस्तार हुआ, दृष्टिकोण विस्तृत और विकसित हुआ। वरिष्ठ नेताओं के साथ रोज़ का विचार विमर्श, सत्संग, उनके अलग अलग दृष्टिकोण, ये सब अपने आप में एक शिक्षा थी। मैं कितना भी पढ़ लेता, इतनी कम अवधि में इतना ज्ञानार्जन न कर पाता। जेल में रोजमर्रा सुबह खेल कूद जैसे शारीरिक व्यायाम होते, पुस्तकें पढ़ना, वरिष्ठ बंदी नेताओं से देश विदेश की राजनीति पर बातचीत होती। ऐसी गतिविधियों के लिए सबको एकत्र करने का जिम्मा मुझे सौंपा गया।

यह जान कर कि हैदराबाद की मुशीराबाद जेल में अनेक वरिष्ठ नेताओं को रखा गया था, मेरी इच्छा थी कि मुझे भी वहाँ भेज दिया जाय। लेकिन लंबे समय तक मेरी यह इच्छा पूरी न हो सकी। मैं तरह तरह से अपनी यह इच्छा को पूर्ण करने की जुगत लगाता। विशाखापत्तनम जेल में मैंने जेल वार्डर, वहाँ के डॉक्टरों और नाई से जान पहचान कर रखी थी जिनके माध्यम से संदेशों को भेजता या प्राप्त करता। आपातकाल के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए मित्रों और सहयोगियों से संपर्क करने के लिए मैं कभी कभी पेट दर्द के बहाना करता जिससे मुझे KGH अस्पताल भर्ती कराना पड़ता और मैं अपने सहयोगी मित्रों से संपर्क कर पाता। एक दिन जब आपातकाल के एक प्रमुख शिल्पी विशाखापत्तनम में जन सभा संबोधित करने वाले थे, हम लोगों ने जन सभा में व्यवधान डालने, उसे असफल करने की योजना बनाई। हमारी योजना ऐसी सटीक बैठी कि आयोजकों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी। अब ये बर्दाश्त के बाहर था। जेल के अधिकारियों ने मुझे हैदराबाद जेल भेजने का फैसला किया और मेरी इच्छा पूर्ण हुई।

जैसी कि उम्मीद थी, हैदराबाद जेल में विभिन्न विचारधाराओं के प्रमुख वरिष्ठ लोकप्रिय नेता बंद थे – अलग विचारधारा के, अलग अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के – जनसंघ, समाजवादी पार्टी, स्वतंत्र पार्टी के नेता, ये पार्टियां आपातकाल विरोधी आंदोलन में सक्रिय और अग्रणी भूमिका निभा रही थीं। वहाँ संघ के वरिष्ठ नेता तथा कॉमरेड तरिमेला नागी रेड्डी जैसे वामपंथी नेता भी थे। हम बीस लोगों को प्रत्येक बैरक में बाँट दिया गया। ये कारावास एक राजनैतिक शिक्षा थी, सामूहिक चर्चा की जाती या अकेले में विचार विमर्श या फिर प्रश्न और उत्तर के सत्र चलते। यह शिक्षा आज के कोरोना के दौर की ऑनलाइन शिक्षा से बहुत अलग थी।

समाचारपत्रों पर सेंसर था फिर भी मुशीराबाद जेल में स्थानीय विरोध प्रदर्शनों और गिरफ्तारियों की खबरों को काला कर दिया जाता। एक बार अतिवादी गतिविधियों के दो आरोपियों को जेल प्रांगण में ही फाँसी दिए जाने की खबर को भी सेंसर कर दिया गया। तब मैंने उसका विरोध किया और ऐसी सेंसरशिप के खिलाफ कोर्ट गया और कोर्ट का निर्णय मेरे पक्ष में हुआ। परिजनों के पत्रों की भी जाँच होती।

हम करीब 250 बंदी अपनी जरूरतों और गतिविधियों के संयोजन के लिए मेयर का चुनाव करते। हममें से हर कोई बारी बारी राशन के इंतजाम की ज़िम्मेदारी लेता और भोजन तैयार करता। हर बंदी को दिन के रू 6 दिए जाते। मैंने तभी खाना बनाना भी सीखा।

एक दिन भोजन की तैयारी करने की बारी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आंध्र प्रदेश इकाई के अध्यक्ष स्वर्गीय श्री सुब्रमण्यम शास्त्री की थी और मेनू में फिश करी थी। मैंने उनको प्रस्ताव दिया कि आज भोजन की तैयारी मैं कर लेता हूं, तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए कहा कि “मैं भले ही शाकाहारी हूं और आप मांसाहारी। आज के संयोजक के रूप में मुझे अपना काम निष्ठापूर्वक करना चाहिए क्योंकि मैं आपके अपनी रुचि के अनुसार भोजन करने के अधिकार का आदर करता हूं।” दूसरों की आज़ादी और उनकी पसंद की इज्जत करने का मेरा यह पहला पाठ था और मैं आज भी उस बहुमूल्य सीख को अपने जीवन में अंगीकार करता हूँ।

हालांकि वहाँ वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं के मौजूद होने से सबका मन जोश से भरा होता था, फिर भी कुछ बंदियों को जेल से छूटने की बेचैनी हो रही थी। उनमें से कुछ निराश होकर कहते थे कि रिहाई की कोई उम्मीद नहीं। मैं उनके साथ जोशीले विरोध प्रदर्शनों, अभियानों और देश भर में आपातकाल के खिलाफ लड़ाई, अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा बढ़ती आलोचना और आपातकाल के खिलाफ अंतिम जीत की संभावना की खबरें साझा करता, उनका मनोबल बढ़ाता था।

चिंताकुल लोगों का मनोबल उठाने के लिए, मैंने शारीरिक व्यायाम के अलावा त्योहारों को मनाने और मौज-मस्ती के साथ विशेष कार्यक्रम आयोजित करने की पहल की। विशाखापट्टनम जेल में जनवरी 1976 में संक्रांति उत्सव कई विशेष व्यंजनों सहित चार दिनों तक मनाया गया। त्योहार से पहले 15 दिनों के लिए, हमने प्रतिदिन दैनिक भत्ते के 6 / – रु बचाए। कुछ साथी बंदी ‘आरिस’ चाहते थे, जो संक्रांति के लिए एक स्थानीय व्यंजन था, लेकिन हमारे बीच ऐसा कोई नहीं था जो उसे तैयार कर सके। एक लंबी खोज के बाद, हमने वह बन्दी पकड़ ही लिया जो उसे बनाने में माहिर था। जब हम चावल के आटे, गुड़ और घी से बने ‘आरिस’ को सुखा रहे थे, एक उत्तर भारतीय जेल अधीक्षक वहाँ से गुज़रा और हमारे प्रयास को देखकर बहुत प्रभावित हुआ और उसे चखने पर उसने हिचकिचाते हुए ही उसकी प्रशंसा भी की।
इस बीच, हमें नियमित रूप से उत्तर भारत की जेलों में लोगों के उत्पीड़न और दक्षिण सहित पूरे देश में बलात् सामूहिक नसबंदी की खबरें मिल रही थीं। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, बीजू पटनायक, नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी, चरण सिंह, चंद्रशेखर (हालांकि वे तत्कालीन सत्तारूढ़ दल के प्रतिष्ठित नेता थे ), देवेगौड़ा, एल.के. आडवाणी, रामविलास पासवान, मधु दंडवते, रामकृष्ण हेगड़े, सिकंदर बख्त, नीतीश कुमार, आरएसएस के बालासाहेब देवरस जैसे नेता … किसी भी राजनीतिक हैसियत के हर व्यक्ति को जेल में डाल दिया गया। लेकिन आपातकाल के खिलाफ आंदोलन ने स्थानीय नेतृत्व को उभरने का अवसर दिया जिसके तहत उसने गति पकड़ी।
आपातकाल की काली अवधि संसदीय लोकतन्त्र के निकायों और संस्थानों की अवनति और विघटन के रूप में जानी जाती है जो उन 21 महीनों के दौरान और उससे पहले हुआ। उस समय सार्वजनिक जीवन का अवमूल्यन हुआ। भ्रष्टाचार तेज़ी से फैल रहा था। किसी भी अलग मत के प्रति असहिष्णुता अपने चरम पर पहुँच गई थी। यह सब असुरक्षा की भावना की शुरुआत थी। संविधान को तो लगभग त्याग ही दिया गया था। सरकारी निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का अधिकार खत्म कर दिया गया था। नागरिकों के मौलिक अधिकार गहरे दफन हो गए थे। चाटुकार अब मुखिया बन गए थे। मेधावी अधिकारियों को ‘हाँ जी’ कहने को मजबूर होना पड़ा। स्वतंत्र विवेकी और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध न्यायाधीशों की वरिष्ठता को दरकिनार कर, आज्ञाकारी लोगों जगह दी गई। संक्षेप में कहें तो सब ओर निराशा का अंधेरा फैला था।

वह फिल्मों और अखबारों की सेंसरशिप समय का निजाम था। पत्रकार इंटेलिजेंस ब्यूरो की कड़ी निगरानी में थे। प्रेस परिषद को समाप्त कर दिया गया था। बीबीसी और वॉयस ऑफ अमेरिका का प्रसारण रोक दिया गया था। किस्सा कुर्सी का, आंधी, आंदोलन और ऑल द प्रेसिडेंट्स मेन जैसी फिल्मों की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। श्री आडवाणी ने मीडिया परिदृश्य पर सटीक टिप्पणी की है; “जब झुकने के लिए कहा गया, तो वे रेंगने लगे”।

अंधेरे को रोशनी के लिए रास्ता बनाना ही पड़ता है। जब आपातकाल के खिलाफ जन आंदोलन चरम पर पहुँच गया और अंतरराष्ट्रीय मत भी इसके खिलाफ हो गए, तो इसने गलत करने वालों को पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया। बंदियों को रिहा किया जाने लगा। आखिरकार 17 महीने की कैद के बाद मुझे जनवरी, 1977 में नेल्लोर जेल से रिहा कर दिया गया। आपातकाल के प्रभाव पर भ्रामक सूचना के कारण मार्च, 1977 में लोकसभा के लिए चुनाव करवाए गए। जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ओंगोल लोकसभा क्षेत्र से मेरा चयन हुआ क्योंकि जयप्रकाश नारायण चाहते थे कि सभी राज्यों से छात्र नेता मैदान में उतरें। यह मेरा पहला चुनावी मैदान था। देश आपातकाल की सामूहिक यातना और ज्यादतियों के खिलाफ गुस्से में भड़क उठा। दक्षिण भारत में आपातकाल का नकारात्मक परिणाम कम था क्योंकि कुछ मुख्यमंत्री इसे लागू करने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। जब मतपेटियों को खोला गया, तो देश के लोगों ने, प्रायः गरीब और अशिक्षित मतदाताओं ने अपने मन की बात प्रकट की और अपने मौलिक अधिकारों के हनन और अपने जीवन की गरिमा के घोर उल्लंघन का विरोध दर्ज किया। जनता पार्टी सत्ता में आई, हालाँकि दक्षिण में उपलब्धि कम थी। हालांकि मैं हार गया, लेकिन मुझे आगे रख कर जनता के सामने मेरे विशाल जुलूस निकाले गए, जनता पार्टी केंद्र में सरकार बनाने के लिए चुनी गई थी। जनता पार्टी सरकार ने आपातकाल से ठीक पहले और आपातकाल के दौरान संविधान को क्षति से बचाने का प्रयास किया था।

आपातकाल, जून, 1975 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा प्रस्ताव पर चर्चा किए बिना ही आंतरिक अशांति के आधार पर लगाया गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ती सार्वजनिक नाराज़गी और परिवर्तन की इच्छा को देश की सुरक्षा के लिए खतरा मान कर संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग किया गया था। जनता पार्टी सरकार ने 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान के प्रासंगिक प्रावधानों में ज़रूरी परिवर्तन किए, जिससे केवल बाहरी आक्रमण या युद्ध की स्थिति के आधार पर आपातकाल लगाये जाने की सीमित गुंजाइश रह गई। अब जीवन का अधिकार निरस्त नहीं किया जा सकता था।

जून 1975 में लगाए गए इस नाजायज और दमनकारी आपातकाल से पहले, देश को 1962 में चीन और 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान भी दो बार आपातकाल के तहत रखा गया था। लेकिन इन दोनों अवसरों पर, देश के लोगों में देशभक्ति का जज़्बा पैदा हुआ। उस दौरान राजनीतिक और सामाजिक जीवन बाधित नहीं हुआ था।

1975 के नाजायज आपातकाल के खिलाफ हमारे देश के लोगों का संघर्ष, मेरे विचार में, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन की गरिमा की रक्षा में एक राष्ट्रीय आंदोलन था। ज्यादातर गरीब और अशिक्षित होते हुए भी प्रबुद्ध देशवासी आजादी के बाद पहली बार उन चीजों की संवैधानिक मर्यादा की रक्षा में एकजुट हुए, जो हमारे संसदीय लोकतंत्र की नींव हैं। सार्वजनिक जीवन में लाखों जननेताओं के गैर वाजिब कारावास ने और जुझारू कार्यकर्ताओं ने जीवन की बुनियादी आजादी के मूल्य को पहचाना। 1977 में चुनावी फैसला स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में एक मिसाल बना। मैं उन देशवासियों की संघर्ष की भावना को नमन करता हूं, जिन्होंने बैलट की शक्ति के माध्यम से आपातकाल को हटाकर एक नए अध्याय की शुरुआत की। ऐसी स्थितियों में हमारे देशवासी ने हमेशा दमखम दिखाया है।

वर्तमान कोरोना ने वैध और स्वैच्छिक प्रतिबंधों के माध्यम से बंदी लगाई है, इसने बुनियादी स्वतंत्रता के महत्व को दोहराया है। निस्संदेह हम जल्द ही फिर से सामान्य जीवन जीयेंगे।
आज जब हम वर्तमान बंदी से निपट रहे हैं, मैंने 1975 के आपातकाल के अनुभव को याद किया। आजादी के 2 साल बाद जन्में, मेरी पीढ़ी के कई लोगों की तरह, मुझे भी अक्सर अपने महान स्वतंत्रता संग्राम में भाग न ले पाने का अफसोस हुआ है। हालाँकि, मुझे आपातकाल के खिलाफ लड़ाई में भाग लेने वाले व्यक्तियों की आज़ादी का बचाव करने में अपनी छोटी सी भूमिका निभानी थी, जिसे मैं दूसरा स्वतंत्रता संग्राम मानता हूँ। एक भूमिगत संदेशवाहक, एक रसोइया, एक आयोजक, एक अध्येता, एक मनोबल बढ़ाने वाला, एक योजनाकार, सभी लोगों की स्वतंत्रता के निष्ठावान रक्षक और आपातकाल के खिलाफ एक प्रचारक के रूप में मेरी भूमिका थी।

संविधान द्वारा सुनिश्चित की गई स्वतंत्रता, जीवन की गरिमा की आधारशिला है। आइए हम जीवन की गरिमा की रक्षा करें। सुरक्षित रहें। नियमित शारीरिक व्यायाम और सही भोजन के साथ स्वस्थ रहें। एक दूसरे से जुड़े रहें। आज़ादी से सांस लेने के लिए कोरोना वायरस को हराएं। सम्यक जानकारी प्राप्त करके अपने आप को और अपने जीवन को और जानने हेतु समय का सदुपयोग करें।( 25 जून 2020 को उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू की फेसबुक पोस्ट)

एम. वेंकैया नायडू