देश की अमूर्त विरासत है ‘कुंभ मेला’

Shahi SnanShahi Snan at Kumbh Mela 2019

प्रयागराज। प्रयागराज कुंभ मेला के रंग में सराबोर है। इस बार कुम्भ को भव्य एवं दिव्य बनाने के लिए खास इंतज़ाम किए गए, इसमें देश दुनिया से करोड़ों लोग शामिल हो रहे हैं। युगीन आस्था, परंपरा, ज्ञान और कथाओं को सहेज कर रखने की वजह से हम समृद्ध विरासत के धनी हैं, ऐसी विरासत जिसका सानी पूरी दुनिया में नहीं है। कुंभ मेला भी हमारी एक ऐसी ही विरासत है । युनेस्को ने भी ये माना है कि कुंभ दुनिया में तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा और शांतिपूर्ण समागम है, यूनेस्को ने इसीलिए कुंभ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की मान्यता भी दी है।

Aarti at Kumbh Mela

Aarti at Kumbh Mela

कोई भेदभाव नहीं 

दुनिया भर में जहां एक तरफ हर समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है,कुंभ मेला सम्मिलन और सहिष्णुता की अद्भुत मिसाल है।  इसे उल्लास मय सामाजिक अनुष्ठान कहा जा सकता है क्योंकि समाज के सभी वर्ग के लोग बिना किसी भेदभाव के समान उत्साह से कुंभ मेले में शामिल होते हैं । हिंदुत्व में आस्था रखने वालों के लिए ये मेला एक धार्मिक अनुष्ठान है तो वहीं दुनिया भर से आने वाले पर्यटकों के लिए कुंभ मेला योग, अध्ययन और हिन्दू रीति रिवाज को समझने का एक मौका होता है । मेले में शामिल होने वाले तमाम अखाड़े और उनकी संस्कृति दुनिया भर के लोगों में कौतुहल पैदा करती है ।

आस्था का प्रतीक

कुंभ मेला भारत के लोगों की अपनी परंपराओं में अगाध आस्था का प्रतीक तो है ही, ये कुंभमेला से जुड़े ज्ञान का सदियों से चला आ रहा वाहक भी है । इस मेले में शामिल हो रहे संत और साधु अपने शिष्यों को पारंपरिक अनुष्ठानों और मंत्रों से संबंधित ज्ञान प्रदान करते हैं । ये परंपरा सदियों से चली आ रही है और समय बीतने के साथ और समृद्ध होती जा रही है ।

Artwork Samudra Manthan at Prayagraj Kumbh

Artwork Samudra Manthan at Prayagraj Kumbh

 

प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में होने वाले कुंभ का समय और स्थान विक्रम संवत कैलेंडर के ज्योतिषीय गणना के आधार पर तय किया जाता है। भारत के ये चार शहर अद्भुत शक्तियों से युक्त माने जाते हैं । कुंभ मेले से संबंधित कई कथाएं प्रचलित हैं, उन्हीं में से एक है कि समुंद्र मंथन के बाद निकले अमृत कलश के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच हुए युद्ध की । मान्यता है कि देव-दानव युद्ध में अमृत की बूंदे पृथ्वी के इन्हीं चार शहरों में गिरीं थीं, इसीलिए हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है । बारहवें साल में महाकुंभ और छठे साल अर्धकुंभ मनाया जाता है ।

कुंभ मेले के दौरान स्नान के प्रति लोगों की अगाध आस्था होती है, करोड़ों लोग स्नान के लिए मेले का रुख करते  हैं लेकिन इस दौरान मेले में शामिल होने वाले अखाड़ों का आकर्षण भी कम नहीं होता ।

साधू-संतों का समूह हैं अखाड़ें

अखाड़े साधू-संतों का समूह होता है और हज़ारों साल से हमारी संस्कृति का हिस्सा है । सनातन धर्म में संतों का जितना महत्व है उतना ही महत्व इन संतों के लिए बने अखाड़ो का भी है । आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म के प्रचार- प्रसार के लिए चार पीठों की स्थापना की और इनकी रक्षा के लिए अखाड़ों को बनाया । उस वक्त से लेकर अभी तक ये अखाड़े संत परंपरा की रक्षा करते आ रहे हैं ।  कुंभ मेले के दौरान ये अखाड़े ना सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी चर्चा का विषय बन जाते हैं। मेले में इनका शाही स्नान देखने लायक होता है ।