व्यवस्था बदली तो चीन नहीं हम होंगे सबसे आगे

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नई दिल्ली। पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो होगे खराब, यह पुरानी कहावत अब बदल चुकी है और अब खेलकूद कर लोग दुनिया में देश का नाम रोशन कर रहे हैं। बजरंग पुनिया, सौरभ चौधरी, राही सरनोबत, और स्वप्ना बर्मन  जैसे तमाम खिलाड़ियों ने अपने खेल से इस कहावत को कई बार गलत साबित किया है।

विपरीत हालात नहीं आते आड़े

खिलाड़ियों की फेहरिस्त लंबी है लेकिन इतनी लंबी भी नहीं जिसमें भारत जैसे देश की महात्वाकांक्षाओं को समेटा जा सके । इस बार एशियाड में हिमा दास, स्वपना बर्मन, सरिताबेन गायकबाड़ और दुती चांद जैसी खिलाड़ियों ने ये साबित कर दिया है कि देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, ज़रूरत बस उन्हें संवारने की है । एशियाड में मेडल दिलाने वाले ज़्यादातर खिलाड़ी ऐसे हैं जिन्होंने अपनी जिद की बदौलत कामयाबी हासिल की है । कमजोर आर्थिक स्थिति, मूलभूत सुविधाओं का अभाव और मुश्किल पारिवारिक हालात के बीच भी इन खिलाड़ियों ने जीत के जुनून को पीछे नहीं छोड़ा और इसीलिए हम इतने मेडल जीत पाए। क्या होता अगर ये खिलाड़ी हिम्मत हार गए होते ? क्या होता अगर इनके परिवार ने इनका साथ नहीं दिया होता ? ऐसा नहीं है कि इन खिलाड़ियों की जीत के बाद ये सवाल बेमानी हो गए हैं ।

Medal Tally Asian Games 2018

Medal Tally Asian Games 2018

चीन हर साल मारता है बाज़ी

ऐसे ना जाने कितने खिलाड़ी होंगे जो सच में हिम्मत हार गए होंगे, जिनके परिवार ने साथ नहीं दिया होगा और जिन्हें स्थानीय स्तर पर कोच नहीं मिला होगा और जहां हम सैकड़ों मेडल जीत सकते थे वहां हम 69 मेडल पर खुशी मना रहे हैं । 2018 एशियाड में भारत का ये सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है, हमने 15 गोल्ड मेडल जीते हैं लेकिन हमने 1951 में हुए एशियाड में भी 15 ही गोल्ड जीते थे । तब से अब तक हम 15 गोल्ड से आगे नहीं बढ़ पाए हैं । गोल्ड के मामले में हर बार चीन बाज़ी मार ले जाता है ।

पहले एशियन गेम्स का आयोजन भारत में ही किया गया था । 1951 से अब तक 18 बार एशियाई खेलों का आयोजन किया जा चुका है, हर चौथे साल एशियाई खेलों का आयोजन किया जाता है ।

शुरुआत से लगातार 8 बार मेडल तालिका में जापान नंबर वन रहा था, 1982 में पहली बार चीन नंबर वन पोजीशन पर आया और तब से अब तक चीन ने शीर्ष स्थान पर कब्जा जमाए रखा है ।

क्रिकेट में हम आगे बाकी खेलों में चीन

जनसंख्या के मामले में चीन लगभग 1 अरब 42 करोड़ के साथ पहले नंबर पर हैं और हम लगभग 1 अरब 36 करोड़ जनसंख्या के साथ दूसरे नंबर पर, लेकिन खिलाड़ियों के मामले में हम कहीं पीछे रह जाते हैं । क्रिकेट के मामले में चीन हमारे सामने कहीं भी नहीं ठहरता लेकिन बाकी खेलों में हम चीन के सामने नहीं ठहर पाते, तो क्या हमारा पूरा ध्यान क्रिकेट पर ही है ?

भारत में स्पोर्ट्स को लेकर पहला इंस्टीट्यूट 1961 में बना। सरकारी स्तर पर खेल विभाग का गठन 1982 में किया गया तो स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया का इसके दो साल बाद 1984 में बना । साल 2000 से देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए अलग से खेल मंत्रालय तक बना दिया गया है । स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के ज़रिए मंत्रालय देश भर में खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने के लिए काम करता है । इन कामों के लिए हर साल बजट में सैकड़ों करोड़ रुपए दिए जाते हैं । यहां सवाल ये उठता है कि इसके बावजूद क्यों अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए खेलने जा रहे हमारे खिलाड़ियों के पास कायदे के जूते तक नहीं होते । क्या स्पोर्ट्स अथॉरिटी को दिया जाने वाला बजट कम है ?

हम विश्व में सबसे तेज़ी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था हैं बावजूद इसके मेडल तालिका में इरान जैसे आर्थिक संकट से जूझ रहे देशों से भी पीछे हैं । क्या इसके लिए स्पोर्ट्स को लेकर बनाई जा रही हमारी नीतियां जिम्मेदार हैं ? क्यों हम इस मामले में चीन से सीख नहीं ले सकते । चीन में खेल को लेकर इतनी गंभीरता है कि बच्चों को बचपन से ही बेहतरीन प्रशिक्षण दिया जाता है। रोज़ाना उन्हें घंटों अभ्यास कराया जाता है जबकि भारत की हालत ये है कि यहां ज्यादातर बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं।

खेलों को लेकर चीन की रणनीति हमसे अलग है

चीन में हर तरह के खेलों पर ध्यान दिया जाता है, चाहे वो रोइंग हो, ट्रैम्पोलिन हो या फिर सेलिंग हो। हर खेल में चीन चैंपियन तैयार करने की कोशिश करता है ताकि स्पोर्ट्स के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों के हर खेल में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके। इसके लिए चीन अपने खिलाड़ियों की कोचिंग के लिए दुनिया भर के बेहतरीन खिलाड़ियों को बुलाने से भी नहीं हिचकता जबकि भारत सभी प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा तक नहीं ले पाता ।

चीन में सरकार अपने एथलीट्स को आर्थिक तौर पर इतनी मदद करती है कि एथलीट इसे अपना करियर मानते हैं । एथलीट्स को कभी भी घर चलाने के लिए बाकी विकल्पों पर ध्यान नहीं देना होता । भारत में इसी तरह की व्यवस्था किए जाने की ज़रुरत है । ज़रुरत है कि देश के खिलाड़ियों के जरिए ही खेल को बढ़ावा दिया जाए । देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार अधिकारी हर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए एक रणनीति बनाएं । खेल में मेडल जीतने को गर्व से जोड़ा जाए तब जाकर शायद हम भी चीन और अमेरिका जैसे देशों को टक्कर दे पाएंगे । देश में ना तो प्रतिभा की कमी है ना ही खिलाड़ियों की, बस ज़रुरत है खिलाड़ियों के मिलने वाली वाली सुविधाओं को बढ़ावा देने और इनकी हौसलाअफज़ाई करने की ।