‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ मूल मंत्र की प्रेरणा देता है भारतीय संविधान

‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ मूल मंत्र की प्रेरणा देता है भारतीय संविधान : अर्जुन राम मेघवाल

अर्जुन राम मेघवाल

संविधान दिवस पर विशेष

26 नवम्बर संविधान दिवस पर विशेष

आज़ादी के बाद देश कई मुश्किल दौर से गुजरते हुए आज इस मुकाम पर पहुँचा है कि हमने नये भारत की मज़बूत बुनियाद रख दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुशासन का मूलमंत्र ‘सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास’ है और इसकी प्रेरणा हमें भारतीय संविधान से ही मिली है। देश के नीति निर्माताओं का भारतीय संविधान मार्गदर्शन करता है और यह राष्ट्र के लिए सौभाग्य की बात है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संविधान की भावना के अनुरूप देश के कमज़ोर तबके को सिर्फ मूलभूत सुविधाओं तक सीमित नहीं रखकर उसे विकास की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं। समाज का कमज़ोर और वंचित तबका अब राष्ट्र के विकास में योगदान देने के लिए आगे आ रहा है।

संविधान दिवस

वर्ष 1949 में भारतीय संविधान को अंगीकार करने की वर्षगाँठ के रूप में राष्ट्र, 26 नवम्बर को संविधान दिवस मना रहा है। वर्ष 1979 तक हम इस दिन को राष्ट्रीय विधि दिवस के रूप में मनाया जाता रहा और वर्ष 2015 के बाद से इसे संविधान दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। वह संविधान जो समय के साथ-साथ सभी कठिन परीक्षाओं से गुजरा है, लगातार हमारा मार्गदर्शन कर रहा है और इसकी वर्षगांठ संविधान के निर्माताओं के नेक विचारों के अनुरूप कर्तव्यपरायण कार्य करने के लिए प्रेरित करती है और मन में अत्यन्त गहरा प्रभाव डालती है।

कर्तव्य के प्रति समर्पण

सदियों से भारतीय परम्पराओं और मनोवृतियों ने कर्तव्यों के प्रति विशेष बल दिया है। यहाँ तक कि स्वामी विवेकानन्द ने भी ‘कर्तव्य के समर्पण’ को ईश्वर की पूजा का सर्वोच्च रूप कहा है। राष्ट्रपिता महात्मा  गाँधी जी ने भी सभी नागरिाकों की आर्थिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियों पर ज़ोर देते हुए कहा है कि,  ‘अधिकार का सच्चा स्त्रोत कर्तव्य है। यदि हम सभी अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तो अधिकारों की तलाश नहीं करनी होगी। यदि हम अपने कर्तव्यों को पूरा किए बिना अधिकारों के पीछे भागते हैं,  तो उन्हें पाना असंभव हो जाता है, जितना हम उनका पीछा करते हैं, उतना ही वे अधिक दूर हो जाते हैं’। यद्यपि मूलरूप से भारत के संविधान में नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों की व्यवस्था को सम्मिलित नहीं किया गया था, लेकिन संविधान सभा में संविधान के मसौदे पर विचार-विमर्श के दौरान, जब मौलिक अधिकारों की बात की गई, तब कुछ सदस्यों ने राष्ट्र के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों के मुद्दे को स्पष्ट रूप से उठाया। संविधान सभा के सदस्य श्री प्रभुदयाल हिम्मतसिका जो 18 नवम्बर, 1949 में संविधान के मसौदे पर चर्चा के दौरान पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने कहा, ‘मैं चाहता हूँ कि मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्य भी ज़रूर हों, यदि हम अपने अधिकारों से ज्यादा कर्तव्यों के बारे में सोचते हैं, तो हमारी बहुत सी कठिनाइयाँ समाप्त हो जाएँगी और अधिकार स्वयं प्राप्त हो जाएँगें और ऐसा कोई अवसर नहीं होगा जहाँ अधिकारों को प्राप्त करने में कोई कठिनाई होगी’।

इसी प्रकार संविधान सभा के अन्य सदस्यों, श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा (संयुक्त प्रांत), पंडित ठाकुर दास भार्गव (पूर्व पंजाब), श्री अर्जुन चन्द्र गुहा (पश्चिम बंगाल), श्री नंद किशोर दास (उड़ीसा), श्रीमती दुर्गाबाई (मद्रास), श्री हर गोविंद पंत (संयुक्त प्रांत), डॉ. बी पट्टाभि सितारमैया (मद्रास), प्रो. के.टी शाह (बिहार), प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना (संयुक्त प्रांत), पंडित हृदय नाथ कुंजरू (संयुक्त प्रांत), काका भगवन्त राय (पटियाला और पूर्व पंजाब संयुक्त राज्य) ने भी जोर देकर कहा कि अधिकारों के साथ कुछ कर्तव्य जरूर जुडे़ होने चाहिए और नागरिकों को राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों के लिए जागरूक होना चाहिए। बाद में, वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन में दस मौलिक कर्तव्यों को संविधान में सम्मिलित किया गया और वर्ष 2002 में 86वें संविधान संशोधन में एक और कर्तव्य को शामिल किया गया।

21वीं सदी के नेतृत्व का लक्ष्य

आज संविधान को अपनाने के 70 वर्ष पूर्ण होने पर, यह हमें राष्ट्र के प्रति अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों को लेकर जाग्रत होने, पुनर्विचार करने और कार्य करने हेतु आहवान करता है। ऐसे समय में जब नए भारत ने 21वीं सदी का नेतृत्व करने, जलवायु परिवर्तन का समाधान करने, समयबद्ध तरीके से 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की मज़बूत अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, तो हमारा यह उतरदायित्व है की हम ऐसी कर्तव्यनिष्ठ जीवनशैली अपनाने की और अग्रसर हों और राष्ट्र को आगे बढ़ाने के लिए उतरदायित्व पूर्ण कार्य करें ताकि निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके। आधुनिक विश्व की सभी प्रमुख समस्याओं का समाधान करने के लिए ‘कर्तव्य’ शब्द एक प्रकाश स्तम्भ की तरह है।

पृथ्वी पर सीमित प्राकृतिक संसाधन हैं। 20वीं शताब्दी बड़े विकासात्मक एवं प्रगतिशील परिवर्तनों की गवाह रही है, हमने बड़े स्तर पर औद्योगिकीकरण, अवसंरचना निर्माण और उत्पादन के उन्नत साधनों को विकसित किया परन्तु इसके लिए हमने स्वकेन्द्रित होते हुए प्राकृतिक संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन किया, परिणामस्वरूप प्रकृति के इस दोहन ने हमने अपनी भावी पीढ़ियों के प्रति अपने कर्तव्य को नज़रअंदाज कर दिया।

वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे विषय विश्व के लिए जटिल समस्या हो गये हैं और अंतराष्ट्रीय मंचो पर प्रत्येक चर्चा में यह विषय महत्वपूर्ण हो गये हैं। आज जब विश्व का प्रत्येक राष्ट्र इस तरह के खतरे से निपटने के लिए गंभीरता पूर्वक विचार कर रहा है तब सामूहिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह इसके लिए सकारात्मक कार्य करे। जीवनशैली में नैतिक, विधिक और नागरिक कर्तव्यों को अपनाने के लिए व्यक्तिगत रूप से किए गए प्रयास इस चुनौतीपूर्ण परिदृश्य में आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

जब सरकारें, संस्थाएं, संगठन और समाज नागरिकों के अधिकारों और उनके जीवन को आसान बनाने के लिए कार्य कर रहें हैं,  तब प्रभावशाली और लाभदायक परिणाम के लिए एवं सम्पूर्ण प्रणाली के निर्णय और कार्यों को बल प्रदान करने के लिए व्यक्तियों के कर्तव्य सदैव निहित होते हैं। व्यवहारिक रूप से प्रत्येक जगह चाहे वह स्कूल हो, घर हो, कार्य स्थल हो अथवा न्यायालय हो, कर्तव्य पर अधिकार को वरीयता दी जाती है, जबकि वास्तव में ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज हमें यह समझने की आवश्यकता है कि प्रत्येक अधिकार के साथ कर्तव्य का एक अंतर्निहित सबंध होता है और अब जागृत होने का समय आ गया है कि जब हम इस परिवर्तनकारी नज़रिये को अपनाने हेतु एंव उस दिशा में कार्य करने हेतु अपने को प्रस्तुत करें।

नागरिक का नैतिक कर्तव्य

वस्तुतः नैतिक कर्तव्य व्यक्तिगत व्यवहार से संबंधित होता है। उदाहरण के लिए अपनी प्रगति एवं विकास के लिए अच्छी शिक्षा व बेहतर वातावरण पाना बच्चों का अधिकार है तो वृद्धावस्था में अपने माता-पिता की सेवा करना व उनका ख्याल रखना बच्चों का नैतिक कर्तव्य भी है। मिलावट, जमाखोरी, कालाबाजारी, कम गुणवता के उत्पाद एवं भ्रष्टाचार के अन्य साधनों को प्रश्रय देने से दूर रहना एवं कार्य-कुशलता को बढ़ाना प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। इन प्रवृतियों को बदलने के लिए प्रयास करना और उस दिशा में काम करना हमारा सर्वोच्च कर्तव्य है।

भारत हमेशा से दुनिया को अहिंसा का मंत्र देता आया है, इस स्थिति में हिंसक घटनाओं का घटित होना हमारे लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण क्षण है, हालाँकि इतिहास इस बात का गवाह रहा है की विरोधों ने अक्सर सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन को प्रेरित किया है और मानव अधिकारों के दायरें को बढ़ाया है परन्तु इन अधिकारों का प्रयोग करते समय नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वह सार्वजनिक संपत्ति जैसे रेलवे, सड़क, ऐतिहासिक स्मारकों, सांस्कृतिक विरासतों, सरकारी भवनों आदि की रक्षा करें एवं उनको क्षति पहुँचाने वाली हिंसक गतिविधयों से दूर रहें।

विधिक और नागरिक कर्तव्य कानून के रूप में उपस्थित है, और नागरिकों द्वारा उनका पालन करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए अच्छी सड़कें, अवसंरचना विकास, बेहतर परिवहन सुविधाएँ प्राप्त करना यदि नागरिकों के अधिकार हैं तो ट्रैफिक नियमों का पालन करना उनका कर्तव्य भी है इसी प्रकार मूलभूत घरेलू सुविधाएँ जैसे बिजली, स्वच्छ पानी प्राप्त करना नागरिकों के अधिकार हैं तो उनका यह भी कर्तव्य है कि वे बिजली व पानी की अनावश्यक बर्बादी ना करें। यदि साफ-सुथरी गलियाँ प्राप्त करना हमारा अधिकार है तो हमारा यह कर्तव्य भी है कि हम कूड़े को इधर-उधर ना फेकें अपितु उसे सही तरीके से नष्ट करें अथवा उचित कूड़ेदान में ड़ालें। नागरिक बेहतर स्वास्थ्य और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ पाने के हकदार हैं लेकिन स्वच्छता, टीकाकरण को अपनाना, सफाई के लिए प्रयास करना और वैज्ञानिक तरीके से इसके प्रति जागरूक होना नागरिकों का प्रथम कर्तव्य है। वास्तव में नागरिकों का यह अधिकार है कि उन्हें प्रदूषण मुक्त वातावरण और प्राकृतिक आपदा मुक्त माहौल मिले लेकिन इसके लिए सरकारी प्रयासों के साथ-साथ स्वैच्छिक नागरिक सेवा, नदियों की सफाई, बेकार भूमि पर वृक्षारोपण, वन संपदा का संरक्षण, पर्वतों की सुरक्षा एवं जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को अपनाने की भी आवश्यकता है।

भारत विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र

हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि भारत विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र है और नागरिकों को वयस्क मताधिकार प्राप्त है, परन्तु जनतांत्रिक भाव को सुदृढ़ बनाने के लिए मतदान करना उनका कर्तव्य भी है। इसके अतिरिक्त जीवन को सुख पूर्ण बनाने के लिए बेहतर सार्वजनिक सुविधाएँ प्राप्त करना नागरिकों का अधिकार है तो राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के लिए समय पर कर भुगतान करना उनका कर्तव्य भी है।

भारत जैसे विकासशील देश के नागरिकों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने स्थानीय और राष्ट्रीय विकास की माँग पूरी करने के लिए उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करते हुए अधिकारों और कर्तव्यों का एक संपूर्ण सतुंलन बनाने का प्रयत्न करें। यदि किसी व्यक्ति को किसी समय अपने कर्तव्य का पालन करने में खुशी का अहसास होता है, तो वह व्यक्ति सशक्त होकर निकलता है। इस वैश्विक रूप से जुड़ी हुई दुनिया में राष्ट्रीय जीवन में एक अच्छे नागरिक की विशेषता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

जब तक हम कर्तव्यनिष्ठता और उत्तरदायित्वपूर्ण संस्कृति को बढ़ावा नहीं देते हैं, तब तक भारत की प्रस्तावना व अनुच्छेद 51 ए में निहित लक्ष्यों और उद्देश्यों को पूर्णरूप से प्राप्त नहीं कर सकते हैं। समय की माँग है कि हम इन कार्यों को कर्तव्यनिष्ठता से करें। इन कर्तव्यों को निष्ठा, समर्पण और दृढ़ निश्चय से कार्यान्वित करने से न केवल सरकार एवं सार्वजनिक संस्थाओं के सकारात्मक कार्य का महत्व बढ़ता है बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के भावी जीवन को सुखी और भविष्य को बेहतर बनाता है।

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एक कदम से 125 करोड़ कदम

27 जुलाई, 2017 को रामेश्वरम में डॉ एपीजे अब्दुल कलाम स्मारक का लोकार्पण करते समय माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ‘कलाम’ की राष्ट्र की परिकल्पना पर जोर देते हुए कहा कि ‘यहाँ 125 करोड़ लोग हैं और यदि हर एक व्यक्ति एक कदम रखता है तो देश 125 करोड़ कदम आगे पहुँच सकता है।’ अतः कर्तव्यपरायण जीवनशैली को अपनाने की ओर एक कदम चाहे वो घर हो, कार्यस्थल हो, सार्वजनिक स्थल हो या इस संविधान दिवस के अवसर पर अंतरात्मा में हो, यह भारत के संविधान के संस्थापकों केा विनम्र श्रद्धांजलि होगी और यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नये भारत के निर्माण में निर्णयात्मक काम करने के लिए एक ऐतिहासिक क्षण होगा।

लेखक भारत सरकार में केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री और भारी उद्योग राज्य मंत्री हैं।