हिंदी के विरोध के बाद, एचआरडी मंत्रालय ने किया मसौदे में सुधार

नई दिल्ली  दक्षिणी राज्यों से हिंदी पढ़ाए जाने का विरोध के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानि एनईपी मसौदे में सुधार किया है।

बदलाव के बाद ये कहा गया है कि छात्र जो तीन भाषाओं में से एक या दो में बदलाव करना चाहते हैं, वे ऐसा कक्षा 6 या 7 में कर सकते हैं।इस पैराग्राफ का अब शीर्षक ‘त्रिभाषा फार्मूला में लचीलापन’ दिया गया है।

यह संशोधन नीति के मसौदे में किया गया है और 30 जून तक जनता के सुझावों के लिए मंत्रालय की वेबसाइट पर रखा गया है।

एनईपी के आलोचकों का कहना है कि गैर हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी थोपी जा रही है।

मसौदा नीति में यह भी कहा गया है कि तीन भाषा फार्मूला देश भर में लागू करने की जरूरत है। ऐसा बहुभाषी देश में बहुभाषा संचार क्षमताओं के लिए जरूरी है।

इसमें कहा गया, “इसे कुछ राज्यों, विशेष रूप से हिंदी-भाषी राज्यों में बेहतर तरीके से लागू किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकीकरण के लिए है, हिंदी-भाषी क्षेत्रों के स्कूलों को देश के अन्य हिस्सों की भाषाओं को सिखाना चाहिए।”

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में क्या है?

के. कस्तूरीरंगन समिति ने हाल में केंद्र सरकार को सौंपे अपने राष्ट्रीय शिक्षा नीति मसौदे में त्रिभाषा फार्मूले को लागू करने का सुझाव दिया है।
कस्तूरीरंगन समिति ने राज्यों को हिंदीभाषी और गैर हिंदीभाषी में बांटा है और सुझाव दिया है कि गैर हिंदीभाषी राज्यों में त्रिभाषा प्रणाली के तहत अंग्रेजी और राज्य की क्षेत्रीय भाषा के साथ हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए। समिति ने सुझाव दिया है कि हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के साथ देश के अन्य हिस्सों की आधुनिक भारतीय भाषाओं में से किसी एक को पढ़ाया जाए।

क्यों हो रहा है विवाद ?

इस मसौदे में ये साफ नहीं किया गया है कि आधुनिक भारतीय भाषाएं कौन सी हैं । तमिल भाषा को सरकार ने क्लासिकल भाषा का दर्जा दिया है। इस मसौदे के सार्वजनिक होने के बाद तमिलनाडु में इसका खासा विरोध किया गया है।

संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य और अन्ना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ई. बालागुरुसामी ने कहा, “आधुनिक भारतीय भाषा क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि तमिल एक क्लासिकल भाषा होने के कारण हिंदीभाषी राज्यों में नहीं पढ़ाई जा सकती? यह सब बातें हिंदी थोपने के बहाने मात्र हैं।”

उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार कहे कि उत्तर, पूरब और पश्चिमी राज्य अपने विद्यार्थियों को एक-एक दक्षिण भारतीय भाषा पढ़ाएंगे, तब हम भी कहेंगे कि हिंदी पढ़ाई जा सकती है।”

डीटीसी बसों, दिल्ली मेट्रो में महिलाएं कर सकेंगी मुफ्त यात्रा: केजरीवाल

पश्चिम बंगाल में भी इसका विरोध हो रहा है। मशहूर कवि और अकादमीशियन सुबोध सरकार ने कहते हैं, “अगर वे हिंदी को कक्षा आठ तक अनिवार्य बनाना चाहते हैं तो मैं पूछता हूं कि बांग्ला को क्यों नहीं? इसे बोलने वालों की संख्या 25 करोड़ है और यह अधिक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। भाषाओं की विश्व रैंकिंग में बांग्ला आम तौर से हिंदी से ऊपर रहती है।”

सरकार ने कहा, “भारत जैसे देश में हिंदी को थोपा जाना स्वीकार्य नहीं है। मराठी, उर्दू, मलयालम और भी कितनी ही भाषाएं हैं। फिर सिर्फ हिंदी क्यों? इन भाषाओं को इनका उचित सम्मान मिलना ही चाहिए।”

केंद्र सरकार ने दी सफाई

मसौदे को लेकर छिड़े इस बवाल के बाद केंद्र सरकार ने सफाई दी है।

केंद्र ने साफ किया कि त्रिभाषा फार्मूला एक सिफारिश मात्र है, कोई नीति नहीं। सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने भी कहा कि समिति ने नई शिक्षा नीति पर अपनी रिपोर्ट सौंपी है। सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है।

पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री जावडेकर ने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं को प्रमुखता दी जाएगी।

https://mhrd.gov.in/relevant-documents

30 जून तक ये मसौदा मंत्रालय की वेबसाइट पर सुझाव के लिए रखा गया है । जनता इस पर अपने सुझाव रख सकती है।